ठाकुरों की ठाकुरैति:
ठाकुर! यह शब्द सुनते ही हमारे मन में एक गरिमामय और रौबदार छवि उभरती है। एक
ऐसा व्यक्तित्व, जो मुँछों को ताव देते हुए, छाती ठोककर कहता है,
"हम ठाकुर हैं!" लेकिन, इस गौरवपूर्ण परिचय के पीछे एक अलग ही दुनिया छुपी हुई है,
जिसे
"ठाकुरैति" कहा जाता है। ठाकुरैति केवल एक शब्द नहीं, बल्कि एक
जीवनशैली है। ठाकुरैति का अर्थ सिर्फ ठाकुर होने से नहीं, बल्कि ठाकुरगिरी करने से है। यह एक मानसिक अवस्था है, जहाँ व्यक्ति को लगता है कि उसकी रगों में सत्ता बह रही है, और बाकी सब उसकी प्रजा हैं। ठाकुरैति का सीधा संबंध भौकाल
से है—अगर आप ठाकुर हैं, लेकिन आपकी
चाल-ढाल में रौब, घोड़े जैसी
अकड़, और बात-बात पर मूंछों पर
ताव देने की आदत नहीं है, तो आपकी
ठाकुरैति अधूरी रह जाती है।
ठाकुर और उनकी पारंपरिक शान
ठाकुरों की पहचान उनकी रौबदार चाल, ऊँची आवाज़, और शानदार मूंछों से होती
है। ऐसा लगता है, जैसे उनके मूंछों के ताव में ही उनकी पूरी शान बसी हो। गाँव
में जब ठाकुर साहब अपनी जीप लेकर निकलते हैं, तो धूल के गुबार के बीच ऐसा
प्रतीत होता है, मानो कोई राजा प्रजा के दर्शन देने निकला हो। उनकी जीप,
जो कभी-कभार
स्टार्ट होने में जिद करती है, उनकी शान का प्रतीक होती है।
ठाकुर का रोब:
ठाकुर साहब के रोब का कोई मुकाबला नहीं। गाँव के चौपाल में जब ठाकुर बैठते हैं तो उनके संवाद "हमने जबान दी है" और "हमने फैसला कर लिया
है" के आगे कोर्ट का फैसला भी फीका पड़ जाए। लेकिन असल में, यह रोब कभी-कभी
अजीब हास्यास्पद स्थितियाँ भी पैदा कर देता है। जैसे, जब ठाकुर साहब की
"ठाकुरैति" मच्छर मारने तक सीमित हो जाती है।
ठाकुर घर का आयोजन: शान और शौकत का मेल
ठाकुरों के यहाँ जब कोई आयोजन होता है, तो पूरा गाँव इसे याद रखता
है। शादी हो या तेरहवीं, ठाकुर साहब इसे "पंचायत-स्तरीय" इवेंट बना देते
हैं। पंडाल में लाइट्स की ऐसी झिलमिलाहट होती है, मानो पूरा गाँव सितारों की
चादर ओढ़े हो। लेकिन, इस भव्यता के पीछे हलवाई की और बिजली विभाग के बिल भरने के चक्कर
मे ठाकुर साहब कितने कर्ज ले लेते है ये कोई नहीं देखता ।
मूड और मूंछ का तालमेल
ठाकुर साहब का मूड उनकी मूंछों से पता चलता है। अगर मूंछें पूरी ताव में हैं,
तो समझिए मामला
गर्म है। और अगर मूंछें थोड़ी झुकी हुई हैं, तो या तो ठाकुर साहब की
भैंस बीमार है, या फिर उनकी पत्नी ने उनकी ठाकुरैति को घर तक सीमित कर दिया
है। यह मूंछ और मूड का तालमेल कभी-कभी इतना हास्यास्पद हो जाता है कि लगता है,
जैसे मूंछें
ठाकुर साहब की भावनाओं का बैरोमीटर हों।
ठाकुर और राजनीति: पावर का जुनून
ठाकुर और राजनीति का रिश्ता उतना ही गहरा है, जितना मूंछ और ताव का।
पंचायत चुनाव से लेकर विधानसभा तक, ठाकुर साहब हर जगह अपनी मौजूदगी दर्ज कराते हैं। भाषण के
दौरान उनकी आवाज़ का जोश और चेहरे का तेज देखकर ऐसा लगता है, मानो उनका
विपक्षी उम्मीदवार सीधे उनके खेत पर हल चला आया हो। लेकिन, जब चुनाव के नतीजे उनके
खिलाफ आते हैं, तो यह जोश एकदम से ठंडा हो जाता है, और वह अपने समर्थकों को
कोसते हुए कहते हैं, "सारी मेहनत बेकार कर दी इन निकम्मों ने।"
ठाकुर का प्रेम
ठाकुरों की ठाकुरैति केवल मूंछों, घोड़े, बंदूक और जीप तक सीमित नहीं होती। उनका दिल भी कुछ कम
"राजसी" नहीं होता। बस फर्क इतना है कि जहाँ आम आदमी प्रेम को दिल से
करता है, ठाकुर प्रेम को इज़्ज़त का मुद्दा बना देता है। ठाकुर साहब जब प्रेम में पड़ते हैं, तो यह "दिल लग गया" वाली बात नहीं होती, बल्कि यह ठाकुर साहब का ठाकुरैति से अछूता नहीं रहता वो
इश्क नहीं, "पराक्रम" कहलाता है।
मतलब जब ठाकुर करे तो रोमांस, जब और कोई करे
तो विद्रोह।
घर मे खूबसूरत पत्नी होने के बाद भी एकाध प्यार उनका बुढ़ापे तक चलता है जिनका उन्हे
गुमान भी होता है और ठाकुरैति ऐसी की उनका प्यार भी उनके रोब और स्टाइल में ही
झलकता है। अगर वह किसी से प्यार करते हैं, तो उसे ऐसे दिखाते हैं, जैसे यह उनकी उदारता हो। और
अगर ठुकरा दिए जाएं, तो उनकी प्रतिशोध की भावना इस कदर प्रबल होती है कि
"हम ठाकुर हैं" का मंत्र उनके लिए संजीवनी बन जाता है।
आज के समय में, ठाकुर साहब को परंपरा और आधुनिकता के बीच सामंजस्य बिठाना
एक चुनौती लगती है। एक तरफ वे चाहते हैं कि उनकी परंपराएं बनी रहें, और दूसरी तरफ
उनके बच्चे शहरी संस्कृति में घुलना-मिलना चाहते हैं। ऐसे में ठाकुर साहब का
गुस्सा और उनकी "ठाकुरैति" दोनों हाशिये पर चले जाते हैं।
ठाकुरों की "ठाकुरैति" महज़ एक परंपरा नहीं, बल्कि जीवन के उन पहलुओं को उजागर करता है, जहाँ शान, रुतबा, और रोब-दाब कभी-कभी हास्यप्रद तो कभी कभी बाप दादाओ द्वारा अर्जित समस्त संपत्ति भी खत्म कर देते है लेकिन तुर्रा ये की नाच तो ठाकुर के बंगले पर ही होगा। ठाकुर साहब की ठाकुरैति को समझने के लिए उनके व्यक्तित्व के कई रंगों को देखना ज़रूरी है। उनका जीवन हमारे समाज का एक दर्पण है, जहाँ परंपराएँ, आदतें, और ठाकुरैति मिलकर कई चित्र बनाते हैं।
©Pankaj Verma


