Friday, 11 April 2025

उम्र, ज़िम्मेदारियाँ और दोस्ती की बदलती तस्वीर


एक दौर था जब हम सब दोस्त किसी बेफिक्री की दुनिया में जीते थे। स्कूल की घंटी के बाद का हर लम्हा, कॉलेज के कैंटीन की हर चाय, और नौकरी की शुरुआत का हर जश्न... जैसे हर दिन कोई त्यौहार हो। वो वक़्त जब दोस्ती महज़ एक रिश्ता नहीं थी, बल्कि जीवन का केंद्र थी। सुबह से लेकर रात तक, सब कुछ साझा था—ख़ुशियाँ, दुख, सपने और यहां तक कि जेब खर्च भी।

लेकिन अब... अब जैसे वक़्त की रफ़्तार तेज़ हो गई है, और हमारे कदम धीरे।


अब वो दोस्त जो कभी बेवजह मिलने चले आते थे, अब महीनों तक एक "कैच अप" की उम्मीद में रहते हैं। कोई नौकरी में उलझा है, कोई घर की EMI में डूबा है, कोई बच्चों के स्कूल की फीस में व्यस्त है तो कोई माँ-बाप की दवाइयों की लिस्ट लिए घूम रहा है।

वो दोस्त जिनके साथ कभी रात भर जागकर भविष्य के सपने बुनते थे, अब नींद पूरी ना हो पाने की शिकायत करते हैं। किसी की आँखों के नीचे काले घेरे हैं, किसी के चेहरे पर चिंता की रेखाएँ। और सबसे अजीब बात ये कि हम सब मान भी नहीं पाते कि अब हम थकने लगे हैं।

ज़िम्मेदारियों का बोझ

कभी सोचते थे कि ज़िम्मेदारी का मतलब है किसी को जवाब देना। पर अब समझ आया कि ज़िम्मेदारी का असली मतलब है—हर दिन किसी और के लिए जीना। अब हर सुबह की शुरुआत किसी के लिए होती है—बच्चों के स्कूल, बॉस की मीटिंग, बीवी की ज़रूरतें, माता-पिता की चिंता। और जब रात होती है, तो अपना थका हुआ चेहरा आइने में देखकर भी मुस्कराना पड़ता है—क्योंकि कल फिर वही सब दोहराना है।

अब दोस्तों से मिलने के लिए तारीख़ें तय करनी पड़ती हैं। व्हाट्सएप ग्रुप में 'चलो मिलते हैं' का मैसेज आता है, लेकिन फिर सब 'इस वीकेंड नहीं हो पाएगा' में बदल जाता है। कभी समय नहीं होता, कभी एनर्जी नहीं होती। और जो मिलते हैं, उनमें से कई अब वैसे मिलते भी नहीं... जैसे कोई औपचारिक मुलाकात हो।

बदन बदल गया है, दिल नहीं...

किसी का पेट निकल आया है, किसी के बाल सफ़ेद हो गए हैं, कोई चश्मा पहनने लगा है, कोई ब्लड प्रेशर की दवाई के बिना नहीं रह सकता। शरीर ने जैसे धीरे-धीरे जवाब देना शुरू कर दिया है। पर अगर आप किसी पुराने दोस्त से दिल से बात करें, तो आज भी उसमें वही पुरानी शरारत मिलती है।

थोड़ा वक्त निकाल कर अगर बैठो, तो अब भी वो किस्से निकलते हैं—वो पहला क्रश, वो कॉलेज के दिनों की मस्ती, वो रात भर की प्लानिंग बिना पैसों के ट्रिप की। और एक हंसी में जैसे थकान कुछ कम हो जाती है।

अब प्राथमिकताएँ बदल गई हैं

पहले जो दिल करता था, वही करते थे। अब जो ज़रूरी होता है, वही करना पड़ता है। पहले घूमने जाना होता था, अब मेडिकल टेस्ट करवाने जाना होता है। पहले शॉपिंग मॉल्स में वक़्त बिताते थे, अब मेडिकल स्टोर में दवाई ढूंढ़ते हैं।

कभी जिन दोस्तों के साथ रोमांस, मस्ती और सपने बाँटे थे, अब उन्हीं दोस्तों के साथ हेल्थ रिपोर्ट शेयर करते हैं—"यार शुगर बढ़ गई है", "BP हाई रहता है", "डॉक्टर ने वॉकिंग के लिए बोला है"।

किसी को घर का लोन चुकाना है, किसी को बच्चों की पढ़ाई के लिए सेविंग करनी है। बीमा, टैक्स, इन्वेस्टमेंट—अब इन्हीं में सारा दिमाग लगा रहता है। और उस बीच, दिल कहीं थका हुआ सा बैठा रहता है।

दोस्ती अब भी है... पर छुपी हुई सी

कभी-कभी पुराने दोस्तों का एक फ़ोन आता है, और घंटों बात होती है। हँसी के साथ-साथ एक टीस भी होती है—क्योंकि कहीं ना कहीं हम जानते हैं कि हमने अपने सबसे अच्छे सालों को खो दिया है। और अब जो बचा है, उसमें वो मासूमियत नहीं, वो मस्ती नहीं।

पर फिर भी, दोस्ती अब भी है। कहीं दिल के कोने में, किसी याद की तरह, किसी धुन की तरह जो सुनाई नहीं देती, पर महसूस होती है।

वक़्त जो ले गया...

वक़्त बहुत कुछ ले गया—उम्र, उन्मुक्तता, और वो निश्चिंतता। अब हर चीज़ की कीमत समझ आने लगी है। अब किसी की आंखों में नमी दिखती है, किसी की आवाज़ में थकावट। जो कल तक खिलखिलाकर हँसते थे, अब मुस्कराना भी सोच-समझकर करते हैं।

कभी-कभी मन करता है कि सब छोड़कर फिर वहीं लौट जाएं, जहां से चले थे। पर अब जान गए हैं कि वो जगह अब कहीं नहीं है—ना हमारे इर्द-गिर्द, ना हमारे भीतर।

तो क्या करें?

कुछ नहीं। बस मान लें कि हम सब थकने लगे हैं, और ये भी एक हिस्सा है ज़िंदगी का। दोस्ती अब भी जिंदा है, बस उसे थोड़ा पानी देना होगा। कभी-कभी पुरानी तस्वीरें देखना, कभी किसी दोस्त को बिना वजह कॉल कर लेना। किसी दिन ऑफिस से छुट्टी लेकर पुराने दोस्तों के साथ बैठना—बिना किसी प्लानिंग, बिना किसी एजेंडा।

क्योंकि जब ज़िंदगी इतनी तेज़ हो जाए कि सांस लेना भी मुश्किल लगे, तब वही पुराने दोस्त हमें फिर से जीना सिखा सकते हैं।

आख़िर में...

हम सब दोस्त अब थकने लगे हैं, ये सच है। पर थकावट का मतलब ये नहीं कि सफर खत्म हो गया। इसका मतलब है कि अब हमें रुककर, बैठकर, पुराने साथियों के साथ कुछ पल बिताने चाहिए। थोड़ी ताज़ी हवा, थोड़ी पुरानी बातें, और ढेर सारी हँसी—यही दवा है इस थकावट की।

क्योंकि आज भले ही बाल पक गए हों, पेट निकल आया हो, और शरीर थक गया हो... पर दोस्ती की रूह अब भी जवान है।

© Pankaj Verma


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